सिगरेट की एक कश और जिंदगी

जमीन पर लेटे लेटे कुछ पढ़ रहा था। परन्तु मन विचलित था , न कुछ और करने का मन हो रहा था और नही पढ़ने में ध्यान लग रहा था , ऐसा जैसे कुछ खो सा गया हो ; सोचा बाहर निकलकर बारामदे में कुछ ठण्डी हवा से ताज़गी महसूस होगी सो उठकर खिड़की खोल दी मैंने । अर्धरात्रि भी गुजर चुकी थी ,निद्रा का कुछ अता पता ही नही था। तकरीबन सुबह के 3 बजे थे, सारा मोहल्ला सो गया था बस कुछ  हमारे जैसे परिंदे जगे थे उनमें से मैं भी एक था । नींद तो अब इस वक़्त आने से रही मुझे,ये दिनचर्या बन चुका था अब तो,सोचा एक कश की तलब मिटा लूं फिर सोने चला जाऊंगा ,एक बार सोने की कोशिश करूँगा शायद नींद भी मुझपर दयाकर के वापस आ जाय,  तुरंत उठकर मैंने किताब मेज पर रख दी और जेब में अपनी महबूबा ( सिगरेट का डिब्बा) खीजने लगा। लेकिन सिगरेट नही मिला, फिर याद आया कि कुछ दिन पहले मैंने आपातकालीन दशा के लिए कही छुपाकर रखी थी, मैं उसकी तलाश करने लगा,किताबो के बीच खोजते खोते कुछ हाथ लगा, खास नहीं था उसमें बस कागज़ थे जिन पर कुछ पुरानी पर्चियां , कुछ खर्चे का बिल, घर से बाहर रहता हूं तो सब हिसाब रखना पड़ता है, तो कुछ खुल्ले पैसे सिक्के की मुद्रा में जो शौक में रखता हूं , सब खोज लिया लेकिन महबूबा नही मिली। मैं ऊपर खोजने लगा विवेकानंद जी की पुस्तक को हटाया – टैगोर को – गांधी को – प्लेटो को भी पर सिगरेट नही मिला । वैसे भी इन किताबों में नशा ज़रूर है पर वो नशा नहीं जो इनको पढ़कर पैदा हुए नशा को सँभालने में सिगरेट देती है । बहुत मशक़्क़त के बाद एक नेपाल की सिगरेट सूर्या  का डब्बा मिला मुझे पर मेरी पसन्द की मार्लबोरो एडवांस नही मिला । पसन्द का कुछ न मिले उस वक़्त जब उसकी तलब हो तो दिमाग़ कोहराम मचा देता है । एक अजीब सा पागलपन और घबराहट को दूर करने के लिए एक कश भी बहुत होता है।

मैं उठकर अपना ट्रॉली बैग में देखने लगा और एक बॉक्स खोल कर उल्टा कर दिया बहुत कुछ गिरा कुछ छोटे छोटे इलेक्ट्रॉनिक, कुछ मेरी बनारस शहर से जुड़ी यादे, सब मिला बस सिगरेट को छोड़कर!

एक सादा खाली पन्ना था(मैंने कभी नाकाम कोशिश की थी तुम्हारे और अपने बारे में लिखने की, कुछ पल जो मैंने खुशियों के साथ गुजारे तुम्हारे साथ) इक याद और इक अधूरा ख़त जो मेरे जेहन के अन्दर था ।

शायद यही इक याद थी, तुम्हारी मेरे पास डिब्बे में बंद पड़ी जिसे खोलते ही फिर वो पुरानी यादें ताजा हो गयी

कुछ लफ्ज़ थे तुम्हारें उसमें मगर आख़िरी फैसला मेरे मन का था–

तुम अगर ये कहना चाहो की

मुझे छोड़ दो या फिर सिगरेट नहीं तो कोई और ढूंढ लेना 

तो मेरा ये जबाब अडिग रहता कि

” और ” का विकल्प नहीं रखता हूँ मै,जिसको पसन्द कर लूं ,उसे छोड़ता भी नहीं मैं , तुमसे बेहतर कोई ‘और’ पा नहीं सकता मैं जिसके साथ खुश रहू ,तुम रहती काश अगर मेरे पास तो ये ‘कश’ भी छूट जाता एक दिन, खैर कोई बात नही अब तुम हो नही, तो जिंदगी एक कश के सहारे चल रही ,

ख़ैर अब ये सब छोड़ो बस  इतना बता दो कोई विकल्प नहीं है मेरे पास दिल और दिमाग दोनों के साथ तुमसे पूछ रहा हूँ —

मार्लबोरो नहीं मिल रही है इसी नेपाली सूर्या सिगरेट में ही खुद को जला लूं आज?

Advertisements

पिता की दशा

हमारे पिता ने

हमारे मुँह पर हमारी कभी तारीफ ना की हो,कभी हमे पुरस्कार  ना दिया हो,कभी गले ना लगाया हो.. लेकिन यकीन मानिए हमारी 1 इंच की कामयाबी के लिए 1 किलोमीटर चलने को राजी रहता है वो शक्श है  पिता ,पिता को पता होता है कि ज्यादा अनुशासन लगा के वो अपने बच्चे की चिढ़ का पात्र बन रहा है लेकिन बच्चे के भविष्य की सुरक्षा के आगे ये कीमत बेमानी लगती है,पिता वो इंसान होता है जिसपे कवितायें नहीं लिखीं जातीं,वो आंसू नहीं बहाता, वो हमेशा परिवार के लिए संघर्ष करता रहता है .. वो बस रास्ते में खड़े, विशालकाय पीपल की तरह चुपचाप बस अपनी जिम्मेदारियों का वहन करता है,पिता वह  होता है जो 40 की उमर में ही नये कपड़े,नया फोन,नये जूते, महंगी घड़ी के लिए ये कहके मना कर देता है कि “अब ये सब की मेरी उमर नहीं रही” और वो मन ही मन खुश होता है, कि बच्चों के लिए कुछ पैसे बच गये।

अपनी इच्छाओ को त्यागकर परिश्रम करके जिस बच्चे को वह पढ़ा लिखकर बड़ा करता है वही पुत्र की शादी होने के बाद पिता को घर से निकाल देता है,जिसे वह अपने बुढ़ापे का सहारा समझ बैठे थे वो पुत्र उन्हें अनाथाश्रम में छोड़कर अलग रहने लगता है। क्या इसी दिन को देखने के लिए पिता ने अपने पुत्र की परवरिश करता है, 

ये मुझे सोचने को मजबूर करता है ,की भारतीय संस्कृति ये तो नहीं थी, माता पिता से बड़ा कोई भगवान नही है इस बात को मानिये, उनके चरणों मे चारो धाम स्थित है।।


आज  Happy Father’s Day मना रहे है, 

हमारी संस्कृति हमें प्रतिदिन प्यार कराना सिखाती है,इसलिए हम फादर्स डे की इज़्ज़त करते है, लेकिन प्यार भी हर रोज करते है। 

आरम्भ है प्रचंड

आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,

आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
आरम्भ है प्रचंड……..
मन करे सो प्राण दे, जो मन करे सो प्राण ले, वही तो एक सर्वशक्तिमान है, -2

कृष्ण की पुकार है, ये भागवत का सार है कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है,

 कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड़ हो जो लड़ सका है वो ही तो महान है!

जीत की हवस नहीं, किसी पे कोई वश नहीं, क्या ज़िन्दगी है, ठोकरों पे वार दो,

मौत अंत है नहीं, तो मौत से भी क्यों डरें, ये जाके आसमान में दहाड़ दो!
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,

आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!

वो दया का भाव, याकि शौर्य का चुनाव, याकि हार का ये घाव तुम ये सोच लो, -2

 याकि पूरे भाल पे जला रहे विजय का लाल, लाल यह गुलाल तुम ये सोच लो,

रंग केसरी हो या, मृदंग केसरी हो याकि केसरी हो ताल तुम ये सोच लो!

जिस कवि की कल्पना में ज़िन्दगी हो प्रेम गीत, उस कवि को आज तुम नकार दो,

भीगती मसों में आज, फूलती रगों में आज, आग की लपट का तुम बघार दो!

आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
आरम्भ है प्रचंड…

आरम्भ है प्रचंड…

आरम्भ है प्रचंड..

हवा का झोंका

दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया “हवा का मामूली झोंका कभी आंधी नही बनेगा,चरखा चला लेने से मोदी गांधी नही बनेगा..”

किसी ने प्रत्युत्तर में कहा :-

“दिया बुझाने के लिए आंधी नही, मामूली हवा का झोंका ही काफी है…

काँग्रेस मुक्त भारत के लिए मोदी नही, राहुल गांधी ही काफी है..!!”

उत्तर प्रदेश का चुनाव 

तूने ऊँगली उठायी तो …….हंगामा हो गया ।


शुभ प्रभात मित्रों, वंदे मातरम !

रोज ८ बजे उठता था। आज नींद ही नहीं आयी 

लगता है आप सभी राष्ट्रवादी मित्रों ने इतनी मेहनत की है, 

यू पी के राष्ट्रवादियों ने ऊँगली उठाई है (EVM का बटन दबाया है, फेसबुक पर माहौल बनाया है) ,

कि यू पी में बीजेपी की सरकार बनना तय है। 

इसीलिए मैं निश्चिन्त लंबी तान के गहरी नींद नहीं सो पाया 

     जिस प्रकार सीमाओं पर हमारे सैनिक 24 घण्टे सतर्क, सशस्त्र हो सीमाओं की रक्षा करते रहते है, अपनी आँखें खुली रखते है

उसी प्रकार आप सभी राष्ट्रवादी मित्र सोशल मीडिया में जागते रहने और जगाते रहने के इस पावन कर्तव्य को निभा रहे हैं। 

तो भला हम जैसे युवा निश्चिन्त होकर कैसे सकते हैं।राष्ट्रवादी मित्रों के जज्बे को शत शत नमन।

तूने ऊँगली उठाई तो ……

हंगामा हो गया ।

वंदे मातरम।
उत्तर प्रदेश में कमल खिलेगा 

प्यार का बदलता स्वरूप

प्यार शब्द ही काफ़ी है । प्यार को परिभाषित करना बहुत ही जटिल है । पहले के समय में जो प्यार का रूप था अब वैसा कुछ नहीं है ।

३ साल पहले जब मैं दिल्ली आया था मेरे एक दोस्त के साथ ऐसा वाक़या हुआ जो याद करके आज भी मैं हसता हु और शर्म भी आती है

बात कुछ ऐसी थी दोस्त के पिताजी दिल्ली के सेंट्रल पार्क में लगे तिरंगे को देखकर देशभक्ति की भावना से पार्क में जाने की इच्छा व्यक्त किए अब दोस्त मना भी नहीं कर सकता था 🤣🤣पापा के साथ क़दम पार्क में बढ़े और बेचारे का दिल सहना ja rha था क्यूँकि हम पहले भी प्रेमी जोड़ों की हरकतों को देख चुके थे । उस दिन पिताजी जब वापस घर आए तो शर्म के मारे खुलकर बोल नहि पाए बस इतना बोले की बेटा 

क्या हो गया है इस देश के युवाओं को 

“प्यार करना है करिए लेकिन थोड़ा शर्म करिए ” ऐसी हरकतें ना करिए 

प्यार की इज़्ज़त कीजिए । 


गांधी परिवार के बुरे दिन 

जो गांधी परिवार दशकों से प्रधानमंत्री के दावेदार हूवा करते थे , 

आज मोदी जी की दहशत ही है ,की मुख्यमंत्री के लिए भी गंभीरता से ये गठबंधन करना पड़ रहा है । 

🤣🤣🤣